Sunday, October 31, 2010

बोलो, तुम विश्वास करोगी ?

यदि मैं कहूं कि तुम बिन मानिनि
व्यर्थ ज़िन्दगी होगी मेरी,
नहीं हंसेगा चांद हमेशा
बनी रहेगी घनी अंधेरी--
बोलो, तुम विश्वास करोगी ?

यदि मैं कहूं कि हे मायाविनि
तुमने तन में प्राण भरा है,
और तुम्हीं ने क्रूर मरण के
कुटिल करों से मुझे हरा है--
बोलो, तुम विश्वास करोगी ?

यदि मैं कहूं कि तुम बिन स्वामिनि,
टूटेगा मन का इकतारा,
बिखर जाएंगे स्वप्न
सूख जाएगी मधु-गीतों की धारा--
बोलो, तुम विश्वास करोगी ?


इसलिए जब भी हंसो, दिल खोलकर

तल्खियाँ सारी फ़ज़ा में घोल कर
क्या मिलेगा बात सच्ची बोल कर

गुम हुए खुशियों के मौसम इन दिनों
इसलिए जब भी हंसो, दिल खोलकर

बात करते हो उसूलों की मियां
भाव रद्धी के बिकें सब तोलकर
क्या बात है
ता फिर न इन्तज़ार में नींद आये उम्र भर
आने का अहद कर गये आये जो ख़्वाब में
ग़म तो ये है कि वो अहदे वफ़ा टूट गया
बेवफ़ा कोई भी हो तुम न सही हम ही सही (राही मासूम रज़ा)

तुम्हारे अह्द-ए-वफ़ा को अहद मैं क्या समझूं
मुझे ख़ुद अपनी मोहब्बत का ऐतबार नहीं

मैनें एहद किया था न उस से मिलूंगा मैं
वो रेत पे लकीर थी पत्थर पे नहीं थी ।
(साहिर लुधियानवी)
भोरौं का गुंजन
बिखरी आदर-सत्कारों की रंगोली
टूट गई मान मनुहारों की डाली

पेड़ों पर लोभ लालच की अमराई
उगी फ़सलों पर गद्दारी की बाली

विकसी दूषित विचारों की फुलवारी
फै़ली पाप-अधम की हरियाली
दया करूणा के पक्षी न आ पाते अन्दर
छल-कपट बन गया मन का माली

वासनाओं से भरा भौंरों का गुंजन
तितलियों के मुख नहीं लाज की लाली

कच्चे पड़ गये प्रण के पत्थर
ढह गई इमारतें मिसालों वाली
आशा पाण्डेय -सृजन गाथा

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